ठन्डे मौसम में शरीर की प्रतिक्रिया

हमारे देश में हर तरह के मौसम मिल जाते है – उत्तर के कड़क मौसम और तटीय इलाकों के नम और गर्म मौसम। जाड़ा, गर्मी, बरसात, बसंत ,पतझड़ बारी बारी से आते जाते हैं। अगले की बारी आने के पहले एक बीच का मौसम भी दिख जाता है। ऐसे बदलते माहौल में नन्हे और नाजुक शिशु की देख रेख कैसे करी जाए इस पर विचार जरूरी है।

मौसम से अभिप्राय सिर्फ बदलता तापमान नहीं बल्कि तापमान के साथ बदलती आद्रता/नमी , हवा का बहाव, रोशनी, धूल, प्रदूषण, और अन्य बहुत से कारक जो शिशु के परिवेश को प्रभावित कर सकते हैं। इनके साथ ही उपलब्ध सुविधाओं पर भी विचार करना होगा।

हमारे शिशु के शरीर की कुदरती तापमान नियंत्रण व्यवस्था भी बदलते मौसम का सामना करने में शिशु की काफी मदद करती हैं। हमारी पारम्परिक प्रथायें जैसे त्वचा पर तेल लगाना, कपड़ो की पसंद इत्यादि भी इस कार्य को प्रभावित करती हैं। शिशु को विभिन्न मौसम में आरामदायक रखने के लिए, ताप मान नियंत्रण के लिए बाहरी उपकरणों की कार्य शैली, शिशु के शरीर की प्रतिक्रिया, शिशु के वस्त्र और हमारी प्रथायें – इन सब की पारस्परिक अंतःक्रिया को समझाना जरूरी है।

इसलिए मुद्दा शिशु के कक्ष के सिर्फ तापमान को नियंत्रण करने का नही है, बल्कि शिशु को ऐसा वातावरण देना जो उसके लिये सुखकर हो। शिशु के स्वास्थ्य की अवस्था के बारे में भी सोचना होगा। अस्वस्थता के चलते शरीर की अंदरूनी व्यवस्थायें भंग हो जाती है।

इस लेख में शिशु के कक्ष के ताप मान और आद्रता के नियंत्रण की फिजिक्स-केमिस्ट्री, गर्म और ठन्डे वातावरण में शरीर की प्रतिक्रिया और विभिन्न कपड़ों के गुण और अवगुण पर चर्चा है। यह मूल जानकारी अभिवावक को सही निर्णय लेने में मदद करेगी। बहुत कुछ उपलब्ध साधनों और परिवार के मिज़ाज पर भी निर्भर करेगा

शरीर का औसत तापमान 37oC/98.6 क्यों रहता है?​
हर जीवित प्राणी का शरीर कुछ गर्म रहता है। अपने को गर्म रखने के लिए शरीर अपनी क्रियाओं से कुछ ऊष्मा लगातार बनाते रहता है।

शरीर की सभी रासायनिक क्रियाओं के लिए ऊष्मा की जरूरत होती है। ३७ डिग्री पर मानव शरीर के हॉर्मोन और एन्ज़ाइम्स अपना कार्य सुगमता से करते हैं। इस तापमान के कम या ज्यादा होने पर इनके कार्य में शिथिलता आ जाती है। फलस्वरूप हम असहज हो जाते हैं, हमारी कार्य कुशलता बाधित होने लगती है और हम जल्दी थक भी जाते हैं। इसलिए शरीर को अपना ताप मान 37oC के आस पास बनाये रखना होता है।

शरीर के तापमान को ३७ डिग्री पर बनाये रखने के लिए शरीर को स्तिथानुसार अपने अंदर लगातार बनने वाली गर्मी को त्यागना या संरक्षित करना (अंदर रोकना) होता है । ऊष्मा के उत्पाद, त्याग और संरक्षण के संतुलन से यह स्थिर बना रहता है। इसके लिए शरीर को कई जतन करने होते हैं।

भगवान ने मानव शरीर को हलके गर्म और हल्के नम वातावरण में रहने के लिए बनाया है। शरीर में ऊष्मा के संरक्षण की तुलना में शरीर से ऊष्मा का त्याग ज्यादा आसान होता है। इसलिए थोड़ा गर्म माहौल शरीर पर इतना प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालता जितना ठंडा।

हमारे स्वास्थ्य की दृष्टि से हवा की नमी भी बराबर महत्वपूर्ण है। सुखकर माहौल के लिए व्यस्थायें बनाते समय इसके बारे में शायद ही सोचा जाता है। ठंडा या गर्म करने वाले उपकरणों के साथ नमी करने वाले उपकरण अवश्य लगाये जाने चाहिए।

भगवान ने हमारे शरीर के ताप मान को स्थिर रखने के लिए एक बहुत मजबूत सिस्टम बनाया है। इसी सिस्टम की सुदृढ़ता की वजह से मानव ठंडी ऊंचाइयों से लेकर रेगिस्तानी पठारों तक कहीं भी निवास कर लेता है। पिछले छः मिलियन वर्षों से मानव का धरती पर निर्बाध अस्तित्व इसी सिस्टम की मजबूती के कारण बना हुआ है। अलग मौसम में अलग प्रतिक्रिया, और कुछ ही समय में अनुकूलन/acclitamization इस प्रणाली की खूबी है।

इस लेख में शरीर के तापमान नियंत्रण की कार्यकि का विस्तृत वर्णन दिया गया है –

Physiology, Thermal Regulation

 

अगर वातावरण ठंडा हो तो हमारे शरीर की गर्मी बाहर निकलने लगती है। ३७ डिग्री पर शरीर का ताप मान बनाये रखने के लिये ठन्डे मौसम में हमारे शरीर में ऊष्मा को अंदर बनाये रखने की कवायद शुरू हो जाती है; साथ ही अतिरिक्त ऊष्मा बनाने की भी।

हमारा शरीर चार तरीकों से गर्मी खोता है –

  1. हमारा शरीर अपनी सतहों के संपर्क में आने वाली हवा को गर्मी देने लगते हैं। इस तरीके को कन्वेक्शन कहते हैं। अगर हवा बह रही है और ठंडी है तो यह हमारे शरीर से गर्मी तेज़ी से निकाल कर अपने साथ ले जाने लगती है।
  2. स्किन के पानी का इवैपोरेशन। हमारी स्किन अंदर से नम होती है। स्किन की सतह के सेल्स में पानी होता है। अगर हवा सूखी है, यानी हवा में नैचुरल वॉटर वेपर की मात्रा कम होने के कारण हवा में नमी कम है, तो स्किन की बाहरी सतह के सेल्स से पानी हवा में इवैपोरेट हो जाता है। इस इवैपोरेशन से शरीर की गर्मी निकल जाती है। और सेल्स की इलास्टिसिटी खत्म हो जाती है, इसलिए यह खुरदरी दिखती है और कभी-कभी फट जाती है। स्किन की बाहरी सतह के सेल्स को एपिडर्मिस कहते हैं, और उनसे पानी के नुकसान को ट्रांस क्यूटेनियस वॉटर लॉस – TCWL कहते हैं।
  3. पसीने का इवैपोरेशन। बाहर की गर्मी के प्रभाव में हमारे शरीर से पसीना निकलता है। पसीने के इवैपोरेशन से गर्मी निकल जाती है। पसीना आने का प्रोसेस TCWL से अलग होता है। पसीना आना एक एक्टिव प्रोसेस है जबकि TCWL बिना किसी कण्ट्रोल के निरंतर होता रहता है।
  4. हमारे सांस लेने वाले अंग फेफड़ों से बाहर निकलने वाली हवा में गर्मी दे देते हैं। यह गर्मी बाहर निकालने की शुरुआत सांस लेते ही शुरु हो जाती है, यानी नाक, गला, सांस की नली और फेफड़े। अगर हवा सूखी हो, यानी नमी कम हो तो यह नुकसान और बढ़ जाता है।

1. हमारा शरीर अपने खुले हिस्सों में ब्लड सर्कुलेशन को एक्टिव रूप से कम कर देता है। इसलिए, सर्दियों में हमारी त्वचा कांतिहीन हो जाती हैं, और अगर ठंड बहुत ज़्यादा हो, तो शरीर के खुले हिस्से नीले दिख सकते हैं, और हमारी हथेलियां, नाक की नोक और कान ठंडे लगते हैं। खुले हिस्सों में ब्लड फ्लो कम होने से, गर्मी का नुकसान कम से कम होता है। शरीर को ऐसे कपड़ों से ढककर जो गर्मी को बाहर न जाने दें, हम अपने शरीर से गर्मी के ट्रांसफर को कम कर सकते हैं। अपने आस-पास हवा का फ्लो कम करने से आस-पास की गर्मी का नुकसान और कम हो जाएगा। बालदार प्राणियों के बाल खड़े हो भीतर की गर्मी संजोने लगते हैं। मानव की त्वचा पर बाल तो ज्यादा नहीं होते परन्तु यह आदिम अनैच्छिक क्रिया/Primitive reflexes मानव की त्वचा के रोंगटे खड़े कर देती है।

2. शरीर से पसीना आना बंद हो जाता है।

3. शरीर का TCWL पर कोई कंट्रोल नहीं होता है। लेकिन तेल या दूसरी तेल जैसी चीज़ें लगाने से यह TCWL कम हो जाता है। अगर हम हवा की नमी बढ़ाते हैं, तो यह TCWL कम हो जाता है, जिससे गर्मी का नुकसान कम हो जाता है।

4. हमारा शरीर ज़्यादा गर्मी पैदा करता है।

 

ठन्डे में शरीर का ताप मान बनाये रखने के लिए शरीर को अतिरिक्त ऊष्मा बनाने के साधनों को किर्यान्वित करना होता है। इसके लिए दो तरह के साधन हैं हमारे पास – shivering methods/कांपना और non shivering methods/ बगैर कापें अंदरूनी ताप बढ़ाने के साधन।

जब हम प्रथम ठन्डे में जाते हैं तो हमारा शरीर कांपने लगता है। इस कम्पन से शरीर में गर्मी पैदा होती है। थोड़े समय ठंड में रह लेने से धीरे धीरे शरीर की ब्राउन चर्बी का जलना सक्रिय हो ऊष्मा उत्पादन का स्रोत बन जाता है और हम बगैर कांपे सर्दी में रहने लगते हैं। इस तरह हमारे शरीर को ठंड में रहने का अभ्यास हो जाता है ; इसको शरीर का पर्यनुकूलन/ acclimatization कहते हैं।

ब्राउन चर्बी मोटापा बढ़ाने वाली चर्बी से फर्क होती है। मोटापा बढ़ाने वाली चर्बी सफ़ेद होती है। ब्राउन चर्बी में वसा के साथ कुछ प्रोटीन और लौह तत्व भी होते हैं। इस चर्बी में ऊर्जा से लबालब mitchondria प्रचुरता से होते हैं, यह शरीर के बिजली घर कहे जाते हैं – यानि ऊर्जा के स्रोत। शिशु और बड़ो दोनों मे, ठन्डे वातावरण में इसके शरीर में जलने से ऊष्मा का सृजन होता है। यह शरीर के बाहरी हिस्से में नही बल्कि अंदर के अंगों में इक्कट्ठा होती है।

बड़ो में ब्राउन चर्बी को बनाने में लिए संतुलित आहार और व्यायाम, दोनों की अहम भूमिका होती है। नव शिशु में ब्राउन चर्बी की मात्रा गर्भ में मिले पोषण पर निर्भर करती है। इसलिए कमजोर शिशु जल्दी ठन्डे पड़ जाते हैं क्योंकि उनको गर्भ में पोषण ठीक तरह से नहीं मिला होता है। जन्म के बाद उचित पोषण से यह शरीर में बनने लगती है। स्तनपान की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है। ज्यादा चर्बी खाने से ज्याद ब्राउन चर्बी बनेगी इस धारणा में न पड़ें। आहार संतुलित रहेगा और बच्चा शारीरिक रूप से सक्रीय, तभी ब्राउन फैट शरीर में उचित मात्रा में बनती है।

अन्य पक्षी कैसे अपने को गर्म रखते हैं, इस लेख में बखूबी लिखा गया है, हम उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं – https://www.fws.gov/story/how-do-birds-keep-warm-winter#

बच्चों में शरीर की तापमान नियंत्रण व्यवस्था अपरिपक्व होती है। शिशु थोड़े ही तापमान के फर्क से ठंडे या गर्म हो जाते हैं। मां के गर्भ में बराबर एक सा तापमान बना रहता है, और साथ में नमी भी। गर्भ में शिशु को इस नियंत्रक प्रलाणी की आवश्यकता न्यूनतम होती है। बाहर आने पर इस प्रणाली के परिपक्व होने में समय लग जाता है।

शिशु और बड़ों की तापमान नियंत्रण व्यवस्था में फर्क –

  • मानव के मस्तिष्क के hypothalmus में शरीर तापमान के नियंत्रण के लिए एक केंद्र होता है जो तापमान नियंत्रण के लिए शरीर की समस्त गतिविधियों में समन्वय बैठा उी गतिविधियों का सञ्चालन करता है। बच्चों में यह केंद्र पूर्ण परिपक्व नहीं होता है।
  • शिशु के शरीर का बाहरी छेत्रफल उसके वजन के हिसाब से ज्यादा होता है। इसलिए ऊष्मा का विसर्जन तेज़ होता है। थोड़ी भी ज्यादा हवा लगे तो शरीर ठण्डा होने लगता है। शिशु-अवस्था में गर्मी शरीर से बाहर विसर्जित करने के लिए शरीर की सतह से ऊष्मा का संवहन मुख्य साधन है। जितना ज्यादा शरीर की बाहरी सतह खुली रहेगी, शरीर की गर्मी उतनी ज्यादा बाहर निकल जायेगी। इसलिए सोते शिशु का शरीर ढ़कना जरूरी हो जाता है क्योंकि सोते समय शिशु के शरीर में गर्मी कम बनती है। अगर शरीर खुला रहे तो गर्मी बाहर निकलती रहेगी और शिशु को ठण्ड महसूस होगी। अगर शिशु ओढ़ने का कपडे हटा देता है तो उसको स्लीप सैक में सुलायें। रोम्पर पहना कर सुलाना भी अच्छा विकल्प है।
  • शिशु में शरीर के वजन के हिसाब से शरीर में रक्त का वॉल्यूम / घनफल कम होता है, और ह्रदय की गति व्यसकों से ज्यादा। इसलिए जिन तापमान नियंत्रक क्रिया में रक्त संचार का कम या ज्यादा होना होता है, वह प्रभावी नहीं होती है। जैसे गर्म में त्वचा का रक्त संचार बढ़ना और ठंड में कम होना।
  • ठण्ड की प्रतिक्रिया में शिशु के शरीर में कम्पन नहीं होता है या बहुत कम होता है। इसलिए शिशु ऊष्मा के उत्पाद के लिए ब्राउन फैट पर ज्यादा निर्भर रहता है। शिशु के शरीर में ब्राउन चर्बी की मात्रा उसके स्वास्थ्य और पोषण पर निर्भर करती है। कम वजन के शिशु या समय से पूर्व जन्मे शिशु के शरीर में ब्राउन चर्बी की कमी से ऊष्मा का उत्पादन कम हो जाता है, यह भी एक कारण है नव शिशु के जल्दी ठंडा पड़ जाने का।
  • शिशु पूर्णतयः अपने देखरेख करने वालों पर निर्भर रहता है, जिनको अपने अनुभव से समझना होता है कि शिशु को गर्मी लग रही है या ठण्ड ? इसके बाद बचाव के उपाय भी देखरेख करने वाले के अनुभव पर निर्भर करते हैं। शिशु अपने कष्ट के निवारण के सही उपाय पर स्वयं निर्णय नहीं ले सकता है।

इन सब क्रियाओं के चलते सामान्य परिस्थितियों में तो शिशु अपना तापमान स्थिर रख लेगा। परन्तु वातावरण के तापमान में सामान्य से ज्यादा परिवर्तन होने पर शिशु की इस प्रणाली पर ज्यादा जोर पड़ जाता है। चूंकि नियंत्रक केंद्र परिपक्व नहीं है इसलिए बदलते ताप मान में शरीर की प्रतिक्रिया भी अपूर्ण रह जाती है, थोड़ी सी. ठंड में शिशु ठंडा और गर्मी में जल्द गर्म भी हो जाता है।

अच्छा पोषण मिलने वाले चपल शिशु का शरीर मजबूत होता जाता है, और पांच वर्ष की उम्र पर, सामान्यतः, उसका तापमान नियंत्रक परिपक्व हो शरीर का तापमान स्थिर रखने में सक्षम हो जाता है।

 

शिशु का माथा देखें , नाक छुए और हथेली को महसूस करें। गर्म लगने पर यह गर्म हो जाएंगी और ठण्ड लगने पर ठंडी।

अधिक स्पष्टता से मालूम करना हो तो शिशु के शरीर का ताप मान देखें, थर्मामीटर से। अगर शरीर का ताप ३६ डिग्री से कम है तो शिशु को और उसके वातावरण को गर्म करने की जरूरत है। अगर ३८ डिग्री से ऊपर है तो कक्ष को ठंडा करना है और शिशु के कपड़े कम करने हैं।

नाक से लेकर फेफड़े तक की अंदरूनी अस्तर, जिसको म्यूकस मेम्ब्रेन कहते है, भी गर्म और ठण्ड में अपनी प्रतिक्रिया देती है। किसी भी प्रतिकूल अवस्था में यह म्यूकस मेम्ब्रेन म्यूकस/श्लेम बनाने लगती है। म्यूकस/श्लेम इस म्यूकस मेम्ब्रेन पर एक रक्षात्मक सतह बना कर म्यूकस मेम्ब्रेन की सुरक्षा करता है।अधिक बनने पर श्लेम बह कर या खांसी के साथ बाहर निकलने लगता है। स्वांस नली को नुकसान पहुँचाने वाले बैक्टीरिया , वायरस या एलर्जी करने वाले तत्वों को अपने साथ बाहर निकाल लेता है।

स्वांश के साथ म्यूकस मेम्ब्रेन की सतह से भी एक सीमित मात्रा में ऊष्मा विसर्जित होती रहती है। अगर स्वांश के साथ अंदर जाने वाली हवा ठंडी हो तो यह म्यूकस/श्लेम ज्यादा बनाने लगता है। यह श्लेम म्यूकस मेम्ब्रेन पर से गर्मी के वसर्जन को रोक देता है। इसीलिये ठंडी हवा से हमारी नाक बहने लगती है। इसी तरह ठंडी हवा के प्रभाव से फेफड़े में भी श्लेम बनने लगता है। यह किसी संक्रमण का संकेत नहीं है।

जाड़े में हवा खुश्क हो जाती है। जब हम कक्ष को गर्म रखने वाला उपकरण इस्तेमाल करते हैं तो यह खुश्की बढ़ जाती है। अगर स्वांस के साथ अंदर जाने वाली हवा अगर खुश्क है तो भी म्यूकस ज्यादा बनने लगता है, इस म्यूकस मेम्ब्रेन की सुरक्षा के लिए। पर अगर यह खुश्की ज्यादा देर तक बनी रहे तो म्यूकस मेम्ब्रेन सूखने लगती है और छिटक भी सकती है।इसके चटक जाने से इस पर संक्रमण हो जाने की सम्भावना बढ़ जाती है।

म्यूकस मेम्ब्रेन की पूरी सतह पर सिलिया/cilia होते हैं। इनको रोमन भी कह सकते हैं। यह सिलिया बराबर इस तरह लहर की तरह हिलते रहतें है। जिससे भी यह किसी भी बैक्टीरिया, वायरस या एलर्जी करने वाले कारक को बाहर ठेल देते हैं। ठंडी हवा के सम्पर्क में आने से इनका हिलना बंद हो जाता ह और साथ ही हानि कारक तत्वों को बाहर ठेलने का काम भी। यह भी एक वजह है जिसके कारण जाड़े में फेफड़े के संक्रमण बढ़ जाते हैं। गर्म और नम हवा में स्वांस लेने से यह सीलिया अपने काम दोबारा शुरू देते हैं। हमे इस बहते श्लेम को किसी दवा से सूखा नहीं करना चाहिये बल्कि नार्मल सेलाइन ड्रॉप्स और नेब्युलाइज़र से इसके बहाव को आसान बना देना चाहिये।

तो, अब यह समझना आसान है कि हम अपने बच्चों में सांस के इन्फेक्शन से कैसे बचें।

  1. बच्चे के कमरे को गर्म और नमी वाला रखें।
  2. सलाइन वॉटर से बार-बार नाक साफ करें और नोज़ क्लीनिंग बल्ब का इस्तेमाल करें। ऐसी दवाइयों से बचें जो बलगम को सुखा सकती हैं।
  3. बार-बार हाथ धोएं।
  4. बच्चे के कमरे में ज़्यादा भीड़भाड़ न होने दें और बच्चे को भीड़-भाड़ वाली जगहों पर न ले जाएं।
  5. कमरे में ताज़ी हवा और धूप आने दें। दोनों ही सबसे अच्छे एयर सैनिटाइज़र हैं।

गर्म और ठंडे आहार, तासीर से नहीं बल्कि ता मान स शरीरको ठंडक या गर्मी पहुंचाने में मदद करते हैं। जाड़े में हल्का गर्म पेय पीने से हम गर्म महसूस करते हैं और गर्मी में हल्का ठंडा पीना हमे सुहाता है। परन्तु आहार अगर ज्यादा गर्म हो तो कान लाल हो जाते हैं, जैसे हम ज्यादा गर्म मौसम में चले गयें हों। मुख में ठंडा रखने मात्र से नाक बहने लगती है मानों जाड़े का मौसम हो। जैसी कि एक सोच है की जाड़े में अधिक कैलोरी वाले आहार और मेवा बच्चों को दी जानी चाहिए – इसमें कोई सत्यता नहीं। बस संतुलित आहार ही दें बच्चों को। अगर जाड़े में कैलोरी की जरूरत बढ़ती है तो बच्चे की भूख भी बढ़ जायेगी।

कपड़ों का काम है तन ढकना, यह अर्थपूर्ण होना चाहिए। तन ढकना सिर्फ तन को सुन्दर दिखाने के लिए या तन की शर्म छुपाने के लिए नहीं; तन ढकने का प्रथम मंतव्य तन की सुरक्षा होना चाहिए, अन्य कुछ भी द्वितीयक। बदलते मौसम की अति से शरीर की सुरक्षा कपड़ों की किस्म पर बहुत कुछ निर्भर करेगी ।

जाड़े में पहनने वाले वस्त्र गर्म कपड़े कहे जाते हैं। यह माना जाता है कि यह गर्मी पैदा करते हैं शरीर को गर्म रखने के लिए। परन्तु ऐसा नहीं है। यह कपड़े शरीर की गर्मी को बाहर विसर्जित नहीं होने देते हैं। यह ऊष्मा के कुचालक होते हैं। इनके जरिये ऊष्मा आगे नहीं बढ़ पाती है। इसलिए अगर गर्म शरीर पर इन्हे पहना दिया जाए तो यह अंदर की ऊष्मा बाहर नहीं जाने देते। शरीर की ऊष्मा अंदर रह शरीर को गर्म रखती है।

अगर शरीर कमजोर है और अपेक्षित ताप पैदा नहीं कर सकता है तो यह गर्म कपड़ा नाकाफ़ी हो जायेगा। तब हमे परिवेशी तापमान बढ़ाना पड़ेगा। गर्म कपड़े का काम शरीर का इंसुलेशन करना है।

भेड़ और ठन्डे में रहने वाले पक्षी, जैसे राज हंस इत्यादि , अत्यधिक ठन्डे छेत्रों में रहते हैं। भेड़ों के शरीर पर घने बाल होने की वजह से उनके शरीर की ऊष्मा बाहर नहीं निकल पाती और अत्यधिक ठण्ड में भी उनका शरीर अपना अपेक्षित तापमान बनाये रखता है। ऐसे ही राजहंस के शरीर पर पंख भी ऊष्मा के कुचालक होते हैं, और उनके शरीर की ऊष्मा को अंदर ही बनाये रखते हैं। इसलिए जो वस्त्र भेड़ के ऊन या बत्तखों के पंखों से बने होते हैं हमे भी गर्म रखते हैं।

भेड़ के ऊन से बने कपड़ो में अगर कोई अन्य फाइबर न मिलाया जाय तो उसको प्योर वूल pure wool कहा जाता है। शिशु और अन्य, जिनको अधिक सुरक्षा की जरूरत होती है उनके लिए यह मुफीद रहेगा। यह प्योर वूल वस्त्र अधिक मोटा न होते हुए भी शरीर की ऊष्मा को सुरक्षित रखते है, वजन में हल्का पर गर्म ज्यादा। यह थोड़ा महंगा होता है, पर वैल्यू फॉर मनी दे देता है।

बस एक सावधानी रखनी है कि यह शिशु की त्वचा के सीधे संपर्क में न आये। इसके संपर्क में त्वचा में हलके रिएक्शन होने से लाल दाने निकल सकते हैं। अंदर मोटा कपड़ा कॉटन का हो, और ऊपर से शुद्ध ऊन का कपड़ा पहना जाए तो यह सबसे अच्छा रहेगा। प्योर वूल वाले वस्त्र पर एक चिन्ह होता है – वूलमार्क। इसको देख कर ऊन की शुद्धता पर इत्मिनान किया जा सकता है।

ईश्वर ने मानव को गर्म रखने के लिए रुई बनाई थी – कुदरती फाइबर। रुई के धागे से बने कपड़े की दो सतह के बीच में रुई भरी बंडी अपने देश में काफी प्रचिलित है। इस तरह के वस्त्र शिशु के लिए मेरी पहली पसंद है। इनसे एलर्जी नहीं होती और इसकी मोटाई को कम या ज्यादा करके इसको कम या ज्यादा गर्म बनाया जा सकता है। वस्त्र की बाहरी सतह पर सिंथेटिक कपड़ा लगा इसकी उपयोगिता बढ़ायी जा सकती है। यह महंगा भी नहीं और न किसी प्राणी को इसके लिए प्रताड़ित किया जाता है। मैं यह मानता हूँ की ईश्वर ने मानव के शरीर पर बाल तो नहीं उगाये ज्यादा, पर उसको रुई एक गिफ्ट की तरह प्रदान करी है – इसको हम ईश्वर का वरदान भी कह सकते हैं। सिंथेटिक फाइबर के विपरीत, इसको बनाने में वातावरण प्रदूषित भी नहीं होता है।

ऐक्रेलिक ऊन –

सर्दी के मौसम के शुरू होते ही बाज़ार रंगीन गर्म कपड़ों से भर जाता है। रस्ते चलते हथ-ठेलों में भीड़ लगा लोग इनको खरीदते दिख जायेंगे। यह देखने में सुन्दर, सिंथेटिक फाइबर के बने स्वेटर इत्यादि हैं। यह ऊष्मा के कुचालक नहीं होते, यानि यह ऊष्मा के बहाव को रोक नहीं पाते, और अधिक ठण्ड में हम देखते हैं कि माँ बच्चे को कई स्वेटर पहना देती है, फिर भी बच्चा ठण्ड से परेशान रहता है। इनका उपयोग हल्की ठंड तक के लिए ठीक है।

 

 

सर्दी के आने के पहले से ही टीवी और अखबार में इनर के इश्तिहार आना शुरू हो जाते हैं। हर इश्तिहार में ऐसा बताया जाता है कि पहाड़ों की सख्त ठण्ड मे भी इनर शरीर को गर्म रक्खेगा। कंपनी इसको थर्मल भी कहती है, मानो इसमें से गर्मी फूट पड़ेगी। इसको बनाने में जो फैब्रिक इस्तेमाल किया जाता है वह सिंथेटिक फाइबर में थोड़ा ऊन मिला कर तैयार किया जाता है। त्वचा के सीधे संपर्क से यह त्वचा को इर्रिटेट कर रैश पैदा कर देते हैं।

यह उतना असरदार भी नही जितना प्रचार किया जाता है। और प्रचार इतना ज्यादा किया जाता है कि परिवारों ने इसे घर की रोज की जरूरतों में शामिल कर लिया है। अगर माँ को इच्छा होती है शिशु को गर्म रखने के लिए, वह उसको सबसे पहले थर्मल पहना देती है।

बच्चों के लिए मैं इसकी संस्तुति बिलकुल नहीं करूंगा। सबसे अंदर का कपड़ा मुलायम और मोटे कॉटन का हो तो वह इस थर्मल से ज्यादा गर्म और आराम दायक रहेंगें।

हाल ही में, मांएं मुझसे पूछने लगीं हैं – उनके बच्चों के लिए कपड़े की कितनी लेयर अच्छी रहेंगी।

मेरी प्यारी MOM, लेयर्स की संख्या नहीं, बल्कि लेयर्स की क्वालिटी मायने रखती है।

भारत में, ढाई लेयर्स काफी हैं, अगर कमरे का टेम्परेचर 23-25°C के बीच और ह्यूमिडिटी 50% से ज़्यादा रखी जाए।

लेयरिंग के लिए मेरे सुझाव ये होंगे:
ऊपरी टॉप के लिए

  • सबसे अंदर का पूरी आस्तीन का कपड़ा जो मुलायम इजिप्शियन कॉटन से बना हो।
  • फिर एक मोटा पूरी आस्तीन का टॉप। आप मोटे फलालैन फैब्रिक का इस्तेमाल कर सकते हैं और इसे किसी टेलर से सिलवा सकते हैं।
  • सबसे ऊपर की लेयर के तौर पर बिना आस्तीन का प्योर वूल स्वेटर
  • अगर कमरे का टेम्परेचर ठीक से कंट्रोल नहीं है तो प्योर वूल की पूरी आस्तीन का स्वेटर। अच्छा होगा अगर कोई इसे बच्चे के लिए बुन सके।
  • बुनी हुई टोपी और मोज़े, या उन्हें फलालैन का इस्तेमाल करके टेलर से सिलवा लें।

शिशु का लोअर

  • हर तीन घंटे में डायपर बदलें।
  • मोटा कॉटन या फलालैन ट्राउज़र।
  • मुलायम मोज़े या पूरा रोम्पर। घर पर बुने हुए ऊनी मोज़े सबसे अच्छे रहेंगे।
 

काला या गहरे रंग गर्मी को अपने अंदर सोखते हैं, सफ़ेद या हलके रंग गर्मी को दूर रिफ्लेक्ट कर देते हैं। इसलिए ठण्ड में गहरे और गर्मी में हल्के रंग के कपड़े पहनाने चाहियें शिशु को। व्यसक भी अपने वस्त्रों के लिए इस बात का ख्याल रक्खें।

 

शीतकाल में शिशु की हिफाज़त के लिये इंतज़ाम करने के लिए कुछ बुनियादी तथ्यों का ख्याल रखना पड़ेगा।

  1. शिशु में ऊष्मा बनाने की क्षमता बड़ों से कम होती है।
  2. शिशु की स्वांश नाली की म्यूकस मेम्ब्रेन बहुत संवेदन शील होती है। अगर शिशु को ठंडी हवा सांस से साथ अंदर लेनी पड़े तो उसके जरिये ऊष्मा की हानि होने लगती है।
  3. खुश्क हवा में स्वांश तंत्र की म्यूकस मेम्ब्रेन जल्दी सूखने लगती है, और सूखने पर आसानी से छिटक भी जाती है।
  4. हमारे देश में जाड़े में हवा खुश्क होती है। और गर्मी देने वाले उपकरण इस हवा की खुश्की और ज्यादा बढ़ा देते हैं।
  5. अगर हवा खुश्क है तो शिशु को ठण्ड भी ज्यादा लगेगी और अगर हवा की नमी बढ़ा दी जाए तो ठण्ड भी कम लगेगी।

इसीलिये गर्म कपड़े ज्यादा पहना देने मात्र से शिशु को ठण्ड से सुरक्षा नहीं दी जा सकती है। कक्ष की हवा को भी गर्म करना होगा, समुचित नमी के साथ। शीतकाल में शिशु के कक्ष का तापमान २२ से २६ डिग्री सेंटीग्रेड और नमी ४० से ६० प्रतिशत रखना उचित रहेगा। गर्मी देने वाले उपकरण के साथ नमी देने वाले उपकरण को भी लगाना होगा।

कमरे का तापमान मापने के लिए रूम थर्मामीटर इस्तेमाल किया जा सकता है। रूम थर्मामीटर के साथ ह्यग्रोमीटर भी संलग्न रहता है, जो नमी को मापता है। यह आसानी से अमेज़न इत्यादि पर मिल जाता है। इस एक उपकरण से कक्ष का तापमान और नमी दोनों को एक साथ मापा जा सकता है।

नमी की कमी से स्वांस तंत्र की म्यूकस लाइनिंग छिटक जाएगी। इसके छतिग्रस्त होते ही इस पर बैक्टीरिया और फंगस पनपते लगते हैं। फलस्वरूप शिशु को निमोनिया और स्वांश संक्रमण इत्यादि होने लगते हैं। इसलिए कक्ष में नमी जरूरी है।

शीतकाल में एक ही कक्ष में ज्यादा लोग इकठ्ठा हो जाते हैं। इनके जरिये भी शिशु को स्वांश में संक्रमण होने की सम्भावन रहती है। शीत की वजह से अभिवावक भी हैंड हाईजीन में लापरवाही करते हैं और अपने संक्रमित हाथों के जरिये शिशु को संक्रमित कर देते हैं । यह शिशु के संक्रमित होने का बड़ा कारण है।

शिशु की त्वचा पर तेल के चुपड़ देने से त्वचा से ऊष्मा कम विसर्जित होती है और त्वचा की नमी का क्षरण भी कम हो जाता है, फलस्वरूप शिशु को गर्म का एहसास मिलता रहता है। तेल या वेसिलीन या लोशन कौन सा लगाया जाय इसकी चर्चा, अध्याय – “बेबी का ब्यूटी पार्लर” के तेल मालिश अनुच्छेद में, विस्तार से करी गयी है।

शीत होने पर भी शिशु की त्वचा की सफाई जरूरी है, इसके आभाव में त्वचा संक्रमित हो जायेगी। वस्त्र भी नित बदल अच्छे से धोये जाने चाहिये। ऊनी वस्त्र के साथ यह संभव नही; इनको तेज़ धूप दिखा सुरक्षित करा जा सकता है। शीतकाल में त्वचा के परिजीवी तेज़ी से पनपने है – स्केबीज़ और जुयें इत्यादि। इनसे बचना होगा।

शीत काल में अभिवावक अपने हाथ धोने में आलस्य करते हैं। और बगैर हैंड हाइजीन किये शिशु की कार्य करने लगते हैं। शिशु की संक्रमण से होने वाली बीमारियों का एक कारण अभिवावकों का हाथों का ठीक से न धोना भी है। अभिवावक शीतकाल में भी हाथ धोने में कोताही न करें।

इस तरह इन उपायों में आपस में सामंजस्य बैठा हम शीतकाल में शिशु को सुरक्षित रख सकते हैं।

हर जीव को गर्माहट चाहिए होती है – इमोशनल और फिजिकल। यह माँ या पिता या बच्चे की देखभाल करने वाले किसी भी व्यक्ति से मिलती है; पास रहने से दोनों मिलते हैं – शरीर की गर्मी और इमोशन। जितना हो सके इसे देने की कोशिश करें। लेकिन बच्चे को घर में रहना होता है। यह भी गर्म होना चाहिए।

गर्मी सिर्फ़ जगह के टेम्परेचर से नहीं होती। इस पर दुसरे फैक्टर्स भी अपना असर डालते है, जैसे ह्यूमिडिटी, एयरफ्लो, कमरे का इंसुलेशन, ताज़ी हवा का आना-जाना, हीटिंग या कूलिंग इक्विपमेंट की क्वालिटी, कपड़े, और तेल और लोशन लगाने का फैमिली कल्चर। बदकिस्मती से, इस मामले पर ज़्यादा रिसर्च नहीं हुई है। यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि आप अपने बच्चे के साथ कहाँ रहते हैं।
मुझे नॉर्थ अमेरिका के ठंडे मौसम के साथ-साथ ट्रॉपिकल इंडिया में रहने का अनुभव है। दोनों जगहों पर, मैं ऐसे परिवारों के साथ रहा हूँ जिनके बच्चे हैं। बहुत ज़्यादा खराब मौसम के हिसाब से कमरे के टेम्परेचर को बहुत ध्यान से एडजस्ट करने की कोशिश करने से कूलिंग और हीटिंग इक्विपमेंट पर बहुत ज़्यादा दबाव पड़ता है । साथ ही, बच्चे को तीन महीने के बाद रेगुलर खुली हवा में बाहर ले जाना चाहिए। आस-पास के टेम्परेचर में अचानक बदलाव से बच्चे के शरीर के टेम्परेचर कंट्रोल करने वाले सिस्टम पर दबाव पड़ेगा, जो कमज़ोर होता हैं, हमारे बच्चे के शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगेगा।

वेस्टर्न लिटरेचर बताता है कि बच्चे के लिए कमरे का आइडियल टेम्परेचर लगभग 220C और 55% ह्यूमिडिटी होता है। वहां का माहौल ज़्यादातर ठंडा होता है, और लोगों को पंखे की आदत नहीं होती। इंडिया में, मुझे लगता है कि हमारे बच्चों के लिए यह ठीक नहीं, बड़ों को भी इसमें ठंड लगती है। मैंने अनुभव किया है कि लगभग 230C से 250C और 55% से 65% ह्यूमिडिटी हमारे बच्चों के लिए सबसे ज़्यादा आरामदायक होती है। ह्यूमिडिटी से हमें गर्मी महसूस होती है। अगर हम ह्यूमिडिटी को नज़रअंदाज़ करते हैं, तो हमें 250 C– 260 C पर भी ठंड लग सकती है।
छोटी खिड़कियों से कुछ देर के लिए हमेशा ताज़ी हवा आने देनी चाहिए। ताज़ी हवा और धूप सबसे अच्छे सैनिटाइज़र हैं।

टेम्परेचर और ह्यूमिडिटी को मॉनिटर करने के लिए हाइग्रोमीटर वाला अच्छी क्वालिटी का रूम थर्मामीटर खरीदना ज़रूरी है। यह Amazon और Flipkart जैसी ई-कॉमर्स साइट्स पर अवेलेबल है।

जिन घरों में सेंट्रल हीटिंग और कूलिंग का इंतज़ाम नहीं है, हमें सर्दियों में घर को गर्म करने के लिए एक्स्ट्रा गैजेट्स का इंतज़ाम करना पड़ता है। सभी डिवाइस में से, मुझे बिना किसी एयरफ्लो वाला रेडिएंट वार्मर पसंद है। यह ज़्यादा फीसियोलॉजिकल है। रेडिएंट वार्मर कुछ सौ रुपये से लेकर कई हज़ार रुपये तक की बड़ी रेंज में मिलते हैं। सस्ते वाले में हीटेड वायर होगा, और महंगे और एडवांस्ड वाले में क्वार्ट्ज़ और ऑटोमैटिक टेम्परेचर कंट्रोलर होंगे। सभी एक जैसे अच्छे हैं। यह एक मिथक है कि वायर हीटर जगह की ऑक्सीजन जला लेते हैं। कोई भी हीटर ऑक्सीजन नहीं लेता।
ऑयल से भरे वार्मर भी अच्छे होते हैं। मुझे ब्लोअर पसंद नहीं हैं। ये शोर करते हैं और बहती हवा अच्छी नहीं होती। क्योंकि इससे TCWL बढ़ सकता है।

कोई भी हीटिंग इक्विपमेंट सर्दियों की सूखी हवा को और सूखा बना देगा, इसलिए ह्यूमिडिफायर ज़रूरी है। ये महंगे नहीं होते। सही ह्यूमिडिफिकेशन के साथ, हीटर की गर्मी देखभाल करने वालों के लिए भी ज़्यादा अच्छी हो जाती है। एयर प्यूरीफायर से बचें। इनके हेल्थ पर असर के बारे में कोई नहीं जानता, और इनमें से ज़्यादातर शोर करते हैं। घरों को गर्म करने के लिए कभी भी बंद कमरों में धुआँ पैदा करने वाले कोयले या लकड़ी का इस्तेमाल न करें।

 

सारे उपकरणों की मौजूदगी के बावजुद अविभावकों की नजदीकी शिशु को सबसे अच्छी गर्मी देती है। शिशु को अपने से सटा कर रक्खें उसको ऊष्मा भी मिलती है और प्यार की गर्मी भी।

कंगारू-मां के पेट के ऊपर एक जेब होती है, जिसके अंदर अपने शिशु को रख कर पालती है। इसके अंदर रहते शिशु, मां की त्वचा के सीधे संपर्क में रह उचित तापमान पर गर्मी पाता रहता है।

हम भी अपने शिशु को इस तरह से गर्म रख सकते हैं। स्टोर्स में इस तरह के वस्त्र मिलते हैं जिसमें शिशु को रख, हमअपने शरीर से चिपका कर अपना काम भी करते रह सकते हैं। या स्वयं बिस्तरे पर लेट, शिशु को नग्न कर, अपने नग्न सीने पर लिटा सकते हैं, ऊपर से कपड़ा उढ़ा शिशु को सुरक्षित कर लेना चाहिए। माता या पिता दोनों ही यह कार्य कर सकते हैं।

अधिक देर तक या ज्यादा ठन्डे में शिशु को रहना पड़े तो वह उसका तन नीला और फिर सफ़ेद दिखेगा। वह शांत और शिथिल हो जायेगा, स्वांश गति और फिर ह्रदय गति सुस्त हो जाएगी। ऐसे शिशु को हलके गर्म कक्ष में लाकर अपने शरीर से चिपका लें। शिशु को हल्की गर्मी मिलने लगेगी। ऐसा संभव नहीं तो शिशु के शरीर के पास हल्के गर्म पानी की बोतल रख गर्मी दें, शिशु के शरीर से थोड़ा दूर, और ऊपर से कंबल या मोटा कपड़ा ओढ़ा दें।

 

मैंने ज्यादातर माताओं को अपने शिशु को ठंड लग जाने की चिंता करते पाया है। वह ठंड लग जाने के डर से शिशु को जरूरत से ज्यादा सुरक्षित करने लगती हैं, गर्मी में भी। मैं माताओं की भावना की कद्र करता हूं, शिशु को अधिक से अधिक सुरक्षा देने की। पर हर अधिक, अधिक लाभप्रद नहीं होता। अति का अधिक भी अधिक नुकसानदेह हो सकता है।

हम सबको अनुकूलतम क्या है इसको समझना होगा।

बदलते मौसम में अनुकूलतम देखभाल के दूरगामी परिणाम –

अनेकों शोध में पाया गया है कि बदलते मौसम में जो बच्चे अनुकूल देखभाल पाते हैं, उनकी कार्य क्षमता तीस वर्ष की उम्र में भी बेहतर रहती है। इस शोध आधारित लेख में इसका विस्तृत वर्णन है –

दुनिया घुमते हूए करीब करीब हर तरह के वातानुकूलित प्रणांलियों को महसूस करने का अवसर प्राप्त हुआ है मेरे को। परन्तु सबसे बेहतरीन समझे जाने वाले वातानुकूलित कक्षों में रहने वाले व्यक्ति को भी बाहर खुली बहती हवा और वानस्पतिक हरे कुदरती वातावरण में निकलना ही पड़ता है। अगर बाहर न निकले तो वह मानव अस्वस्थ्य जरूर हो जायेगा। यह कुदरती वातावरण भी प्रदूषण मुक्त होना चाहिए।

अपने शिशु को भी खुली हवा और कुदरती वातावरण में जरूर ले जाएं , दिन के उस समय जब वातावरण मध्यम हो। अगर मौसम मध्यम हो तो खुली हवा के प्रवेश के साधन घर में जरूर रक्खें। अपने बच्चों के कक्ष को जितना ज्यादा स्वंभव हो कुदरती साधनो से सुरक्षित बनाये और इस कार्य में जितना कुदरत का उपयोग करें उतना बेहतर होगा। अपने घर के चारों तरफ जितने ज्यादा पेड़ पौधे लगाएंगे वातावरण का तापमान उतना नियंत्रित रहेगान हर मौसम में।

वैज्ञानिक शोध पर आधारित इस लेख में हरित वातावरण का स्वास्थ्य पर अनुकूल प्रभाव का विस्तृत वर्णन है –

  • शिशु गर्भ में समुचित गर्म और अत्यधिक नम वातावरण में रह रहे होते हैं।
  • जन्म के बाद उन्हें इससे मिलता जुलता वातावरण मिले तो उचित रहेगा।
  • कक्ष हल्का गर्म – २३ से २६ डिग्री और आद्रता ४० – ६० प्रतिशत। बड़े जो अधिक ठन्डे के अभ्यस्त हैं इस वातावरण में वह थोड़ा गर्म महसूस कर सकते हैं।
  • शिशु के शरीर के तापमान नियंत्रक सिस्टम का विकास धीरे धीरे हो पांच वर्ष तक परिपक्व हो जाता है। तब तक वातावरण के असमान्य होने पर उन्हें अतिरिक्त सुरक्षा की जरूरत रहेगी।
  • शिशु के शरीर का बाहरी छेत्रफल वजन के हिसाब से व्यसकों से ज्यादा रहता है। बच्चों के शरीर से ऊष्मा के विसर्जन का मुख्य साधन है त्वचा से ऊष्मा का संवहन / कन्वेक्शन, और त्वचा की नमी का वाष्पीकरण, पसीना निकलना और उसका वाष्पीकरण। इसलिए शरीर ढकने वाले वस्त्रों के चयन में सोच-समझ जरूरी है।
  • गर्मी में शरीर को आधा ढका जा सकता है परन्तु जाड़े में बच्चे का शरीर पूर्ण ढ़का रहना चाहिए।
  • सोते समय शरीर में बाहरी गतिविधियां नहीं होती इसलिए ऊष्मा का सृजन भी कम होता है। शिशु का शरीर अगर ढका नहीं है तो वह जल्दी ठंडा हो सकता है।
  • शीतकाल में अंदर का वस्त्र कॉटन का रहे और उसके ऊपर प्योर वूल या रुई भरे वस्त्र सर्वोत्तम रहेंगे। थर्मल या इनर की मैं संस्तुति नही करता।
  • रुई भरी बंडी इस कार्य के लिए सर्वोत्तम है।
  • कुछ विशेष जैकेट इत्यादि बनाई जाती है सिंथेटिक मटेरियल की, परन्तु बच्चों के लिए हलके वजन की आरामदेहः सिंथेटिक जैकेट नहीं दिखीं मुझे। वस्त्र का लचीला होना भी जरूरी है। बच्चा उसको पहन आसानी से अपनी क्रियाएं कर सके।
  • ज्यादा ठण्ड में ऐक्रेलिक ऊन के स्वेटर इत्यादि अनुपयोगी होते हैं।
  • त्वचा पर तेल, लोशन या वेसिलीन लगा कर ठंड के असर को कम किया जा सकता है।
  • कक्ष को ठंडा या गर्म करने वाले उपकरणों के साथ आद्रता बढ़ाने वाले उपकरण भी लगाये जाने चाहिये।
  • बच्चे को नियमित स्तनपान से मा के शरीर की गर्मी के साथ उचित ताप मान पर दूध मिलता रहता है।
  • शिशु की देखरेख करने वाल अभिवावक जाड़े में हैंड हाइजीन में आलस ना करें।
  • ठन्डे मौसम में भी बच्चों के नित सफाई जरूरी है। त्वचा के इन्फेक्शन और जुएं और स्केबीज़ से बचाव के लिए।
  • सुरक्षा देते समय अति से बचें। अनुकूलतम पर विचार करें।