गर्मी में शरीर की प्रतिक्रिया

गरम मौसम में हमारे शरीर के बाहरी सतह, याने त्वचा से गर्मी बाहर विसर्जित होने लगती है। इस काम को आसान बनाने के लिए हमारी त्वचा का रक्त संचार बढ़ जाता है। हमारे कान, हथेली, तलवे, और सर, जिनका बाहरी सतह का छेत्रफल ज्यादा होता है, गुलाबी हो जाते हैं। इन्ही अंगों से ऊष्मा बाहर ज्यादा विसर्जित होती है। इस क्रिया को convection कहते हैं। सर के बाल ऊष्मा को बाहर निकलने से रोकते हैं। इसलिए गर्मी में बाल कम किये जा सकते हैं।

भौतिकी के नियम से यह ऊष्मा का विसर्जन तभी तक संभव है जब बाहरी ताप मान हमारे शरीर के ताप मान से कम रहे – ३७ डिग्री सेंटीग्रेड से कम। पर हमारे शरीर में गर्मी काफी तेज गति से बनती रहती है। इसलिए वातावरण के ताप मान शरीर के ताप मान से काफी कम रहना चाहिये तभी शरीर से गर्मी बाहर विसर्जित होगी – २७ डिग्री सेंटीग्रेड से कम। तेज़ गर्मी में यह convection व्यवस्था असफल हो जायेगी।

गर्म मौसम में त्वचा की स्वेद ग्रंथियों से पसीना बाहर आने लगता है। पसीने के वाष्पित/सूखने से शरीर की ऊष्मा कम हो जाती है, याने ठंडक मिलती है। पसीना निकलने का पूरा फायदा लेने के लिए हमे कपड़े ऐसे पहनने चाहियें जिसमे हवा अंदर जा कर पसीना वाष्पित कर सके, या आसान वाष्पीकरण के लिए कपड़ा पसीना को सोख कर सतह पर ले आये। शरीर को ठंडा रखने में पसीने की भूमिका महत्वपूर्ण है। यह प्रणाली तेज़ गर्मी में भी शरीर के ताप मान तो स्थिर रखती है।

बहती हवा त्वचा की सतह से ऊष्मा अपने साथ बहा कर ले जाती है। हम घर के बाहर हों तो हल्की बयार हमे ठंडक देती है और हम ताज़गी महसूस करते हैं। यह धीमी ही रहे तो अच्छी लगती है – तेज़ हवा में हम असहज़ हो जाते हैं। बहती हवा हमारे पसीने के वाष्पित होने की क्रिया को तेज़ कर देती है, और हमें अतिरिक्त ठण्डक मिलने लगती है। पंखों से निकलने वाली हवा इसी तरह हमे ठंडा रखती है, यह भी मध्यम रहे तो ठीक रहेगा हमारे शिशु के लिए।

पसीने के अलावा त्वचा की अपनी नमी के वाष्पित होने से शरीर को ठंडक मिलती रहती है। इस क्रिया को Transcutaneous Water Loss कहा जाता है। वातावरण में नमी ज्यादा हो तो यह क्रिया सुस्त हो जाती है या रुक जाती है। वातावरण में नमी कम हो या कहें कि खुश्की हो तो यह क्रिया तेज़ हो जाती है। इस क्रिया के सुस्त होने पर हम गर्म महसूस करेंगे और तेज़ होने पर ठंडा। वातावरण के ज्यादा खुश्क होने पर अगर त्वचा की नमी कम हो जाये तो त्वचा रूखी हो जाती है और फटने लगती है। त्वचा पर तेल , लोशन या वेसिलीन लगाने से यह क्रिया रुक जाती है और हम ठण्ड के मौसम में गर्म महसूस करते हैं, साथ ही त्वचा मुलायम भी बनी रहती है। गर्म और उमस वाले मौसम में इनके प्रयोग से हम और ज्यादा गर्म महसूस करने लगते हैं।

अधिक तेज़ गर्मी में शरीर की यह तापमान नियंत्रक व्यवस्था भंग हो जाती है, और हमारा शरीर गर्म होता चला जाता है। इस अवस्था को हीट स्ट्रोक कहते हैं।

वातावरण की आद्रता/नमी भी शरीर के तापमान के नियंत्रण पर प्रभाव डालती है। अधिक आद्रता होने पर पसीना और त्वचा का पानी वाष्पित नहीं होता है और हम गर्म महसूस करते हैं। ठण्ड के मौसम में अगर वायु की आद्रता बढ़ा दी जाये तो ठंडक सुहानी लगने लगती है। ऐसे में स्वांश के साथ निकलने वाली वाष्प भी कम हो जाती है।

आद्रता बहुत ज्यादा बढ़ जाए तो हमे घुटन होने लगती हैं। किसी बंद कक्ष में अगर हम घुटन महसूस करते हैं तो वह बढ़ी हुयी आद्रता की वजह से होता है। अधिक आद्रता से हवा भारी हो जाती है और हमें सांस लेने में जोर लगाना पड़ता है।

हमारी धरती का तापमान निरंतर बढ़ता जा रहा है। यह चिंता का विषय है। धरती के बढ़ते ताप मान के साथ शिशु कैसे सामंजस्य बनायेंगे, इस लेख में इस मुद्दे पर चर्चा है –

Pediatric Thermoregulation: Considerations in the Face of Global Climate Change

गर्मी के कपडे

ईश्वर ने अपने सबसे प्रिय संतान मानव को रुई एक विशेष गिफ्ट के रूप में दी है। हल्का कर के पहनों तो गर्मी में सुखकर और मोटा कर बंडी बनाओ तो ठण्ड में गर्म रक्खे।

गर्मी में ढीले और हलके रंग के कपड़े हर किसी के लिए सुखदायी रहेंगे। कॉटन/रुई के धागों के बुनें फैब्रिक से बने वस्त्र ही पहनें और बच्चे को पहनायें। गर्मी को बाहर निकालने के लिए इनके अंदर हवा आराम से अंदर आ जा सकती है। कॉटन पसीना सोख सतह पर ले आता है, जो वाष्पित हो पहनने वाले को ठंडक देता है।

कॉटन के वस्त्र त्वचा को सूखा रखते हैं। इसलिए कॉटन पहनने से त्वचा के इन्फेक्शन बहुत कम होते हैं। हर मौसम में शिशु को अंदर कॉटन का कपड़ा पहनायें। गर्मी में ढीले और हलके रंग के वस्त्र शिशु के लिए सर्वोत्तम रहेंगें।

आल वेदर/all weather कपड़ेया सिंथेटिक कपड़े

आज के व्यापारिक युग में अपने सामान को औरों से कुछ अलग दिखाने और और कुछ एक्स्ट्रा सुविधा देने की होड़ है। इस एक्स्ट्रा को प्रचारित करने के लिए सभी मौसम में काम आने वाले कपड़ों का प्रचार किया जा रहा है।

मैं इनकी संस्तुति नहीं करुंगा। यह सिंथेटिक फाइबर से बुन कर बनाये जाते हैं। कीमत बचाने के लिए खरीदे सकते हैं, परन्तु यह ना गर्मी में सुखकर हैं ना ठण्ड में। इनके अंदर हवा नहीं जाती, पसीना भी अंदर बना रहता है, इसलिए गर्म मौसम में ठंडक नहीं देते। अंदर नमी बने रहने से इनके पहनने वालों को त्वचा के फंगल इन्फेक्शन ज्यादा होते है।

इनमे पसीने के साथ प्रतिक्रिया से कुछ केमिकल भी निकलते हैं – पहनने वाले से पसीने की महक के अलावा एक अलग विचित्र महक आती है। यह केमिकल त्वचा के स्वास्थ्य के लिये भी ठीक नहीं।

हवा इनके अंदर जा नहीं सकती, इसलिए कुछ जाड़े के कपडे इनको परिष्कृत कर बनाये जाते हैं और वह उपयोगी भी होते हैं। परन्तु इनकी केमिकल संरचना की वजह से इनको त्वचा के सीधे संपर्क में नहीं लेना चाहिए।

गर्मी में शिशु सुरक्षा – मूल सिद्धांत

हमारा शरीर मध्यम गर्म और नम वातावरण में ज्यादा सुरक्षित रहता है। फिर भी अत्यधिक गर्मी नुकसानदेह है। वैसे तो पेड़ की छांह काफी होती है हल्की गर्मी में, जब तक खुश्क और गर्म लू ने चले।

बयार बहे जो थोड़ी नम हो, तो हमे ठंडक दे देती है। पेड़ की पत्तियां, सूर्य देवता के तेज़ की प्रचंडता अपने अंदर सोख लेती हैं, हम तक पहुंचती सूर्य की रोशनी ठंडी हो जाती है। ऐसे में शिशु भी खुशनुमा महसूस करते हैं। वनस्पति की हरियाली हर मौसम में वातावरण को मध्यम करने का प्रयास करती रहती है। ऐसा कोई भी उपकरण मानव अब तक निर्मित नहीं कर पाया है।

तेज़ लू गर्म और खुश्क होती है। हमारा मुख, त्वचा और स्वांश नाली अंदर तक सूख जाती है। बरसाती मौसम में हवा की बड़ी हुयी नमी के कारण हमारी त्वचा का पानी और त्वचा से निकला हुआ पसीना वाष्पित नहीं होता , इसलिए ऐसे मौसम में हमें उमस भरी गर्मी लगती है, पसीना बहता रहता है परन्तु हमे ठंडा नहीं कर पाता है। ठहरी हुयी हवा अगर गर्म और अत्यधिक नम हो तो वह भारी हो जाती है और हम सांस लेने में भी तकलीफ महसूस करनें लगते हैं। ऐसे में अगर हवा बहने लगे तो यही हवा सुखकर लगने लगती है।

ऐसे मौसम में अगर हम भारी कपड़े पहन लें तो यह बहती हुयी हवा भी बेकार साबित होगी। गर्मी दूर करने वाले वातावरण के सभी साधन हमारे शरीर के साथ पारस्परिक क्रिया नहीं कर पाएंगे और शरीर गर्म हो जायेगा।

मां के गर्भ में तापमान और नमी इस तरह की होती है कि गर्भ में शिशु को अपने शरीर के तापमान को नियंत्रित करने के लिए कुछ भी प्रयास नहीं करना होता है। नव शिशु जन्म पूर्व गर्भ में अत्यधिक गीलेपन में रह रहे होते हैं। उनके सिस्टम को सूखे वातावरण में एडजस्ट होने में समय लगता है – उनको नम वातावरण में ही रखना उचित रहेगा। और गर्म भी इतना रहे कि शिशु को आदत के अनुसार हल्की गर्मी मिलती रहे और शरीर के तापक्रम नियंत्रण करने वाले अपरिपक्व सिस्टम पर ज्यादा जोर न पड़े।

गर्म देशों में गर्मी के मौसम में शिशु के वातावरण का तापमान २२ से २६ डिग्री और आद्रता ४० से ६० प्रतिशत रहे तो उचित रहेगा। आद्रता और गर्मी में ताल मेल बैठा कर जैसा माहौल सुहाये उसको अपना लें। हवा का बहाव भी न्यूनतम रहे तो शिशु के लिए ठीक रहेगा। यानि पंखे की गति धीमी रहे।

पानी

शरीर की गर्मी को व्यवस्थित करने में पेय पदार्थों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ठन्डे पेय हमे तुरंत ठंडक देते हैं।

हमारा मुख्य पेय पानी है। गर्मी में ठंडक पाने के लिए पसीना निकलता है और त्वचा का पानी भी वाष्पित होता है। अगर पानी कम पिया जाए तो बच्चों को पानी की कमी हो जाएगी, जिसको डिहाइड्रेशन कहते हैं।

मूत्र भी शरीर की ऊष्मा को बाहर निकालता है। पानी अगर समुचित पिया गया है तो मूत्र भी समुचित मात्रा में गर्मी बाहर निकालता रहेगा। परन्तु जो एक धारणा है कि हम सबको पानी ज्यादा पीना चाहिए अच्छे स्वास्थ्य के लिए – यह ठीक नहीं। पानी कितना पीना है यह हमारी प्यास बता देती है। प्यास से ज्यादा पानी किसी के लिए भी ठीक नहीं – न बड़ों के लिए और न बच्चों के लिए।

शिशु को स्तनपान से समुचित पानी मिल जाता है। फार्मूला दूध पानी में ही बनाया जाता है। इसलिए दूध पीते शिशु को अतिरिक्त पानी की जरूरत नहीं होती। बड़े होने पर बच्चे भी प्यास के अनुसार पानी की मांग कर देते हैं।

खुली हवा और हरा वातावरण

दुनिया घुमते हूए करीब करीब हर तरह के वातानुकूलित प्रणांलियों को महसूस करने का अवसर प्राप्त हुआ है मेरे को। परन्तु सबसे बेहतरीन समझे जाने वाले वातानुकूलित कक्षों में रहने वाले व्यक्ति को भी बाहर खुली बहती हवा और वानस्पतिक हरे कुदरती वातावरण में निकलना ही पड़ता है। अगर बाहर न निकले तो वह मानव अस्वस्थ्य जरूर हो जायेगा। यह कुदरती वातावरण भी प्रदूषण मुक्त होना चाहिए।

अपने शिशु को भी खुली हवा और कुदरती वातावरण में जरूर ले जाएं , दिन के उस समय जब वातावरण मध्यम हो। अगर मौसम मध्यम हो तो खुली हवा के प्रवेश के साधन घर में जरूर रक्खें। अपने बच्चों के कक्ष को जितना ज्यादा स्वंभव हो कुदरती साधनो से सुरक्षित बनाये और इस कार्य में जितना कुदरत का उपयोग करें उतना बेहतर होगा। अपने घर के चारों तरफ जितने ज्यादा पेड़ पौधे लगाएंगे वातावरण का तापमान उतना नियंत्रित रहेगान हर मौसम में।

वैज्ञानिक शोध पर आधारित इस लेख में हरित वातावरण का स्वास्थ्य पर अनुकूल प्रभाव का विस्तृत वर्णन है –

गर्मी में आहार की सुरक्षा

गर्मी में किसी भी आहार में कीटाणु तेज़ी से पनप जाते हैं। यह ज़्यादातर विषैले ही होते हैं। इसलिए शिशु आहार एकदम ताज़ा हो तो सर्वोत्तम है। अगर आहार को आगे के इस्तेमाल के लिए संरक्षित करना है, तो पकाने के तुरंत बाद फ्रिज में रख देना चाहिए।

आहार पकाने के दौरान किसी भी तरह की गन्दगी धातक हो जायेगी। गन्दगी से ही आहार को कीटाणु की सप्लाई होती है, जो गर्मी में तेज़ी से बढ़ आहार को विषैला कर देते हैं। इसलिए ताज़े और तुरंत पके आहार ही शिशु को दें।

अगर गर्मी बहुत ज्यादा है तो क्या करना है ?

अत्यधिक गर्म होने पर शिशु को बुखार के साथ पसीना आएगा, चेहरा लाल हो जायेगा और स्वांश की गति तेज़ हो जाएगी। पहले तो शिशु रोयेगा फिर शिथिल हो शांत हो जायेगा।

ऐसे में शिशु के वस्त्र कम करें और कक्ष को हल्का ठंडा कर हलके गर्म पानी से शरीर पोछ दें। पानी धीरे धीरे से वाष्पित हो शिशु को धीरे धीरे ठंडक पहुंचाएगा। तेज़ी से ठंडा करने के उपाय ठीक नहीं।

देखरेख करने वालों के लिए –

यह पंक्तियां पूर्णतयः मैं अपने अनुभव के आधार पर लिख रहा हूं । साधनों से संपन्न व्यसक अत्यधिक ठन्डे ऐ सी में रहने के आदी हो जाते हैं, और मध्यम सम्पन्नता वाले तेज़ पंखों के। शीतकाल में भी अति की आदतें दिख जायेंगी। विभिन्न मौसमों में वस्त्रों का फर्क धूमिल होता जा रहा है। गर्मी में मोटी जीन्स और काली शर्ट, शीत में हलके कपड़ों का चलन। गहरे मोटे वस्त्रों में खुद गर्मी महसूस करके कक्ष को ज्यादा ठंडा करने लगते हैं।

अब यहां व्यसकों की आदतों पर चर्चा की जरूरत क्यों महसूस हो रही है?

ज्यादातर व्यसक शिशु को मिनी-एडल्ट की मानते हैं और उनको अपने से थोड़ा ज्यादा बचाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं। शिशु की विशेष जरूरतों को भूल अपनी सुविधानुसार शिशु के लिए भी व्यवस्थाएं बनाने लगते हैं। उदाहरण – अस्पताल में जन्म के बाद हम माता और शिशु के कक्ष का पंखा धीमा और ऐसी को २७ डिग्री पर चलाने की अनुशंसा करते हैं। परन्तु मिलने वालों की आवभगत में अविभावक पंखा तेज़ और ऐसी और अधिक ठंडा करने में जरा भी नहीं हिचकिचाते हैं।

जिस समय से व्यसक माता पिता बनने की कल्पना करना शुरू करें उनको अपनी इन अति कि आदतों में बदलाव शुरू कर देना चाहिये। ज्यादा कुछ नहीं करना है उनको बस ऊपर शिशु के लिए जो भी अनुशंसा करी गयी हैं उनको स्वयं के लिए भी पालन करना शुरू कर देना चाहिए। कुछ ही समय में वह भी महसूस करेंगे कि यही व्यवस्था उनके लिए भी अनुकूल है, ज्यादा फर्क नहीं।

कैसे बचें गर्मी की बीमारीयों से

गर्मी की शुरुआत हो गई है और साथ ही गर्मी में होने वाली बीमारियां भी अपना चेहरा दिखाने लगी हैं| गर्मी की बीमारियां वायरस और बैक्टीरिया दोनों ही कर सकते हैं| वायरस और बैक्टीरिया ठण्ड के मौसम में कम तापमान होने की वजह से सुप्तावस्था में चले जाते हैं और गर्मी शुरू होते ही पनपने लगते हैं| ये खाने पीने की चीजों में ज्यादा पनपते हैं और साथ साथ उसमें टाकसिन छोड़ते हैं| ये दूषित खाना जिसमें कि बैक्टीरिया और वायरस पनप चुके होते हैं, हम और हमारे खाते ही बीमार पड़ जाते हैं| गर्मियों की मुख्य बीमारियां होती हैं, उल्टी, दस्त, जौंडिस (Jaundice), टाइफाइड, वायरस फीवर इत्यादि| बरसात शुरू होते ही मच्छर, मक्खी पनपने लगते हैं जिससे मलेरिया और डेंगू का प्रकोप बढ़ जाता है|

आईये समझें संछिप्त में कैसे गर्मी कीबीमारियों से बचें| गर्मी की ज्यादातर बीमारियां खाने पीने की चीजों की वजह से होती हैं| इसलिए खाने पीने के एतिहात से ही उनसे बचा जा सकता है| पानी उबला पीयें| RO, Aqua guard filter ये बेकार हैं इसका कोई इस्तेमाल नहीं हैं| रात को फैमिली के साइज़ के अनुसार पानी उबालें और पानी को ठंडा करके सुबह हल्के कपड़े से छान लें और उसको फ्रिज में रख दें या फिर एक बोतल फ्रिज में और एक बोतल बाहर रख दें और बाद में मिलाकर पियें, शीतलता भी मिलेगी और पानी भी वायरस और बैक्टीरिया रहित मिलेगा|

बाहर का खाना न खाएं न ही अपने बच्चो की खिलाये क्योंकि बाहर जो भी व्यक्ति खाना बना रहा है उसकी हाइजीन पर हमारा कोई भी जोर नही है| हमारी कानून व्यवस्था भी उसे कन्ट्रोल नहीं कर पाती है| गंदे हाथों से पकाये गये खाने में बैक्टीरिया पनपेगा, कई घंटों का रखा हुआ खाना वो आपको सर्व करेंगे वह वायरस और बैक्टीरिया से दूषित हो चुका होता है और साथ ही दावत और शादी के खाने में भी यही हाल होता है| इसलिए शादी और दावत के खाने से भी परहेज करें| घर का बना ताज़ा खाना खाएं| खाना बने तो एक घंटे के अन्दर ही खा लिया जाए|

राय तो यह है कि बचा हुआ खाना फ्रिज में न रखें, फ्रिज में रख कर दूसरे दिन खाने से हम बीमार पड़ जाते हैं क्योंकि बिजली आंख मिचौली खेलती है और गर्मियों में हम लोगों को पानी के लिए फ्रिज बार बार खोलना पड़ता है तो ये खाना भी वायरस और बैक्टीरिया से दूषित हो जाता है|

संछिप्त में हाथ धोये बार बार, हेल्थ हाईजीन का ख्याल रखें, खाना ताज़ा खाएं और पानी उबला पियें| गर्मी की इन बीमारियों से आप सुरक्षित रहेंगे|

15 अक्टूबर से 15 फ़रवरी तक आप बाहर का कुछ खा सकते हैं| उसके बाद आप बाहर का कुछ न खाएं, और खाना ताज़ा खाएं| टीकों से भी अपने बच्चे को कुछ बीमारियों से बचाया जा सकता है| जैसे टाइफाइड का एक नया टीका आया है जो कि एक टीका और ६ महीने में दूसरा टीका लगवाने से टाइफाइड से बचत हो सकती है| ये टीका जरुर लगवाएं| हेपेटाइटिस A का टीका JAUNDICE से बचाएगा|

लू लगना – जब हम या हमारे बच्चे तेज धूप में निकलते हैं तो हमारा शरीर गर्म हो जाता है जिससे हमारे फेफड़े और त्वचा तेजी से वाष्प छोड़ते हैं जिसके कारण हमारे शरीर में पानी की कमी हो जाती है और हमारा thermostat (थर्मोस्टेट) बिगड़ जाता है और बुखार आता है जिसे हम लू लगना कहते हैं| तेज गर्मी में बाहर न निकलना ही उचित रहेगा|

गर्मी के कपड़े – गर्मियों में आप अपने बच्चो को हल्के सूती (pure cotton) कपड़े, हल्के रंग के कपडे पहनाये, मोटे सिन्थेटिक कपड़े और जींस इत्यादि पहनने से शरीर से पसीना वाष्पित नहीं हो पाता है और शरीर को ठंडा करने की प्रक्रिया में बाधा पहुंचती है – इससे भी अस्वस्थता का भान होता है |

 

सारांश – ग्रीष्म काल

  • कमरा ठंडा करने के उपकरण का सावधानी से उपयोग करे – उनके अति के प्रयोग से बचे।

  • पंखे या हवा ठंडक प्रदान करने में मदद करते हैं, क्योंकि वे पसीने के वाष्पीकरण और उत्सर्जन दोनों को बढ़ावा देते हैं, और गर्मी को दूर ले जाते हैं (संवहन)।

  • अत्यधिक या तेज हवा का बहाव शरीर से बहुत अधिक गर्मी हटा देता है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, खासकर शिशुओं के लिए। शिशु को तेज हवा में न रखे या पंखा धीमा चलाये।

  • पसीने और उत्सर्जन के कारण पानी की कमी के चलते आपको गर्म मौसम में अतिरिक्त पानी की आवश्यकता होती है। शिशुओं के लिए, स्तनपान की आवृत्ति बढ़ाना पानी की अतिरिक्त जरूरत को पूरा करने का सबसे अच्छा तरीका है।

  • हल्के रंग के, हल्के और शुद्ध सूती कपड़े पहनें। सूती गर्मी का खराब संवाहक है, पसीने को सोखता है, और हवा को अंदर जाने देता है, जिससे ठंडक को बढ़ावा मिलता है।

  • गर्मियों में गहरे रंगों (क्योंकि वे गर्मी को अवशोषित करते हैं), सिंथेटिक कपड़ों (क्योंकि वे हवा/पसीने के वाष्पीकरण को रोकते हैं), और डेनिम जैसे मोटे, भारी कपड़ों से बचें।

  • सूती कपड़े गर्मियों (पसीना सोखना, हवा का बहाव) और सर्दियों (शरीर की गर्मी को बनाए रखना) दोनों के लिए उपयुक्त हैं।

  • यदि कोई शिशु बहुत गर्म हो जाए (बुखार, भारी पसीना, तेज साँस, सुस्ती), तो उसे कपड़ों से बाहर निकालें, कमरे को ठंडा करें, और तापमान को धीरे-धीरे कम करने के लिए गर्म पानी (ठंडा नहीं) से स्पंज करें।

  • अधिकांश गर्मी की बीमारियाँ (जैसे दस्त, टाइफाइड और पीलिया) दूषित भोजन और पानी के कारण होती हैं। उबला हुआ पानी पिएँ और खाना बनने के एक घंटे के भीतर केवल ताजा बना हुआ घर का खाना ही खाएं। बाहर का और बासी खाना खाने से बचें।

  • टीकाकरण (जैसे टाइफाइड और हेपेटाइटिस ए/पीलिया के लिए) कुछ बीमारियों को रोक सकता है। लू लगने (हीटस्ट्रोक) से बचने के लिए, चिलचिलाती धूप में बाहर जाने से बचें, जिससे तेजी से निर्जलीकरण होता है और शरीर का तापमान नियंत्रण बाधित होता है।